Best Hindi Theatre Monologues

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First of all, Here is the Best Hindi Theatre Monologues. This is the monologues that is performed by a great actors. So you can prepare these monologues for auditions or self-practice. These are monologues of Hindi plays, written by the great writers of indian cinema.
As a result, from here you can select any monologue based on gender, age, character requirements. And practice. You can perform it in auditions or workshops or anywhere on stage. In short the monologues will be effective in your acting practice and auditions.

A Good Monologue:

A well written monologue makes them remember you. Good audition monologues will do:

Stay below two minutes: Two minutes is enough time to show your baggage. In fact, auditors and casting directors make their decision after 30 seconds, perhaps even less.

You have a clear objective: You can’t stand there and talk. You have to actively talk to someone you have imagined, and you will be trying to get something from them.

There is a different beginning, middle and end:
A start: a strong first sentence to grab attention.
A middle: lots of juicy ingredients.
An end: a strong finish.
When there is a structure in your monologue, the auditor or casting director is more likely to remember you.

Conflict occurs: Drama cannot exist without conflict. Who wants to see everyone play with?
It can be boring. And also interesting.

मुहम्मद: हमारी अज़ीज़ रियाया। हाकिमे-अदालत, काजी-ए-मुल्क का फैसला आपने सुना। हमारे चंद कारिंदों की वजह से एक बिरहमन के साथ जो जुल्म हुआ, आपने देखा। हमने उस जुर्म का इक़बाल करके इंसाफ-पसंदगी और हक़ का रास्ता इख़्तियार किया है। मजहबी तफरीक की वजह से, टुकडो में बिखरी हुई हमारी सल्तनत की तवारीख में, आज का यह लम्हा हमेशा जिंदा रहेगा। इस पाक लम्हे को गवाह रखकर हम चंद अल्फाज़ तावारीख के पन्नो पर दर्ज कराना चाहते है। हमेशा से हमारी ख्वाहिश रही है कि हमारी सल्तनत में सबके साथ एक जैसा सुलूक हो। खुशियाँ हों, शादमानी हों और हर शख्स को हक़ और इन्साफ हासिल हो। अपनी रियाया के अमनो-अमान ही नही, बल्कि जिंदगी के हम ख्वाहिशमंद है.....जिंदा-दिली और खुशहाली से भरपूर जिंदगी। हम अपनी अज़ीम सल्तनत की भलाई के लिए एक नया कदम उठाना चाहते है। हमारी तजवीज़ है कि इसी बरस हम अपना दारुल-खिलाफा दिल्ली से दौलताबाद लें जाएँ।   हाँ, आप लोगो को हमारी तजवीज़ सुनकर जरुर हैरत हुई होगी। लेकिन हम सबको बता देना चाहते है कि ये किसी मगरूर सुलतान का बेमानी खब्त नही है इसकी ठोस वजह है। दिल्ली हमारी सल्तनत की उतरी सरहद के करीब आबाद है, जहाँ हर लम्हे मुगलों के हमलो का खतरा दरपेश रहता है। और आप जानते ही है कि हमारी सल्तनत दूर दक्खिन तक फैली हुई है। एक दौलताबाद ही हमारी सल्तनत के बाहर सूबों के मरकज में आबाद है। जहाँ से हम अपनी लम्बी छोड़ी सल्तनत के हर कोने पर हुकूमत की मज़बूत गिरफ्त कायम, रख सकते है। इससे भी अहम बात ये है कि दौलताबाद हिन्दुओं की आबादी है। हम अपने दारुल-खिलाफे को वहां ले जा कर हिन्हुओं और मुसलमानों में एक मज़बूत रिश्ता कायम करना चाहते है। इस नेक काम की खातिर हम आप सबको दौलताबाद आने की दावत देते है। दावत दे रहे है, हुक्म नही। जिन्हें हमारे ख्वाबों की सदाकत पर ज़रा भी यकीन हो, वही आयें। महज़ उनकी मद्दत से हम एक ऐसी मिसाली हुकूमत कायम करेंगे जिसे देखकर सारी दुनिया दंग रह जाएँ। हमारे ख्वाबों की ताबीर बनने वालो खुदा हाफ़िज़।
राजबीर: इन चटकती हुई लकड़ियो की आवाजें सुन रहे हैं आप ? ... आप यहाँ मेरी जगह होते तो शायद देख पाते कि ये लकड़ियाँ कितने उत्साह से खुद को भस्म कर देना चाहती हैं इस आग में । शुरूआत में ये बस ईर्ष्या से देखती रहती हैं , आग के बीचो-बीच लाल पड़ती , टूटती-चटकती लकड़ियों को, अपनी बारी का इंतजार करते हुए , बस इनका कोई कोना आग पकड़ ले फिर तो किसी संगीत से भर उठती हैं ये , कोई नृत्य उतरने लगते हैं इनमें । चटकने की हर आवाज़ के साथ कितनी ऐंठ भरी अदा से हिलती हैं ये, जैसे कोई सपना सच हो गया हो और फिर यही चलता रहता है , राख हो जाने तक । और बस स्वपन खत्म ( laughs )
राकेश: आज मैंने सारे दिन दफ्तर में किसी से बात नहीं की ... सुबह से शाम तक दिमाग में कुछ तस्वीरें सी गडमड होकर घूमती रहीं । कभी पुष्पा पिंगले का चेहरा नजर आता, कभी मेरी माँ का और कभी एम . एल . ए . साहब की बेटी सोनिया .... जब मेरा सर ज्यादा चकराने लगा, दिमाग फटने लगा तो मैंने अपनी आँखें बंद कर ली । आँखें बंद की तो दिमाग में एक शोर या उठने लगा । जैसे कोई बाढ़ सी आ गई हो। बाढ़, जिसमें मेरे बापू की नाव डूब गई थी। बाढ़, जिसने मेरी माँ की कलाईयों से लाल हरी चूड़ियां उतार कर काले धागे बंधवा दिए थे। मैंने घबरा कर अपनी आँखें खोल दी।  चार बजे में दफ्तर से निकल गया और सोधे घर आकर लेट गया । रात बारह एक बजे तक में सीलन से भरी हुई छत को देखता रहा । मेरा रूम पार्टनर मोरे(दोस्त का नाम..मोरे) एक बजे घर आया और मुझ से कहने लगा ... " ये लाईट बंद कर दें  ... लाईट में क्या हेमा मालिनी मिलने आयेगी तुझसे । मैंने कहा.. नहीं मोरे वो बात नहीं आजकल पता नहीं क्यों मुझे अंधेरे से डर लगने लगा है । वो बोला " डर लगता है तो अपनी अम्मा को यहां बुलाले " कहकर लाइट बंद कर दी । मुझे बहुत तेज़ गुस्सा आया मेरा मन हुआ कि उसके दौत तोड दू । मगर मोरे से कभी कुछ कह नहीं पाता हूँ कमरे में अंधेरा होते ही मुझे और डर लगने लगा मुझे ऐसा लगने लगा जैसे बिस्तर पर मेरे साथ कोइ लेटा है । कभी लगता जैसे मेरी माँ है , कभी लगता जैसे मेरा कुता गोका है और कभी मुझे ऐसा लगता जैसे सफेद कफन में लिपटी हुई मेरी छोटी बहन शकुन्तला की लाश है ....। मुझे कुछ आवाजें भी सुनाई देने लगी जैसे .. जैसे बैन करती मेरी अम्मा ... अरे कहाँ गई मोर लल्ली रे ... अम्मा को छोड़ कर तू कहाँ गई रे ... मोर लल्ली मोर बिटिया रे .... अचानक लगा कि मेरी आँखों के किनारे से पानी टपक रहा है । ये क्या .... मुझे पता ही नहीं चला कि में रो रहा था।
Chandu: Dekho brother ... apna funda simple hai .... ek hi life hai..maje mein jeene ka .... time paas karne ka , enjoy karne ka ! Arre kaam-kaam-kaam....kisko dikhane ka hai kaam kar ke ? saabit kya karne ka hai ? aisa kya ukhaad loge ? Saala arbon ki aabadi mein ek aad do jan ne nahi bhi kiya kuch kaam to chalega ... koi sunami nahi aa jayega iski wajah se ! par abhi baa ko aur pappa ko kaun samjhaye ... to theek hai..jaane ka shop pe..baithne ka ... mobile pe pub g khelna ka , film vilm dekhne ka ... sham ko waaaps ghar ! Waise bhi ghar mein film vilm dekhno ko allowed hai nahi na bhai ... kya bolti public ?
Nandu: Main nahi jaanta mere shareer ke saath kya ho raha hai, jaane kahaan se safed daane idhar udhar nikal jaate hain, phir unhe dabao toh kuch chip chipi safed si taral cheez bahar nikalti hai. Main pehle ghar ka saara kaam kar leta tha araam se, maalkin toh mujhse badi khush rehti hai, par ab kaam karne ka bilkul mann nahi karta, sab hi pe itna gussa aata hai, bas akele ek kone mein baithne ka mann karta hai, par inka kaam na karun toh waapis gaon bhej denge, mujhe waapis gaon nahi jaana! Par .. chhoti malkin achhi hain, unke liye kaam karna achha hi lagta hai, chhoti malkin apne blouse khud seelti hain, unhone mujhe apne naye blouse ke liye kapda lene ke liye bheja, unhone raamlal se pehle hi baat kar li thi. Blouse ka kapda itna mulayam tha, maine usse mulayam kisi cheez ko kabhi haath hi nahi lagaya hai. Main chhupke se chhoti malkin ko blouse seelte huye dekhta tha, kisi bahaane se unke kamre mein chale jaata tha, blouse ke chhote bekaar kate hisso ko churaake raat ko unpe haath ferta tha. Chhoti malkin ne aaj blouse poora kar liya, main chhupke dekh raha tha, unhone apni salwar utaari, unke toh yahaan (points to armpit) bhi baal the, uss kapde se bhi mulayam lag rahe the. Mujhe wahaan kuch hua, kuch ajeeb, kuch naya, lekin mujhe achha nahi laga.
मैं वास्तव में कौन हूँ ? - यह एक ऐसा सवाल है जिसका सामना करना इधर आ कर मैंने छोड़ दिया है जो मैं इस मंच पर हूँ, वह यहाँ से बाहर नहीं हूँ और जो बाहर हूँ...ख़ैर, इसमें आपकी क्या दिलचस्पी हो सकती है कि मैं यहाँ से बाहर क्या हूँ ? शायद अपने बारे में इतना कह देना ही काफी है कि सड़क के फुटपाथ पर चलते आप अचानक जिस आदमी से टकरा जाते हैं, वह आदमी मैं हूँ। आप सिर्फ घूर कर मुझे देख लेते हैं - इसके अलावा मुझसे कोई मतलब नहीं रखते कि मैं कहाँ रहता हूँ, क्या काम करता हूँ, किस-किससे मिलता हूँ और किन-किन परिस्थितियों में जीता हूँ। आप मतलब नहीं रखते क्योंकि मैं भी आपसे मतलब नहीं रखता, और टकराने के क्षण में आप मेरे लिए वही होते हैं जो मैं आपके लिए होता हूँ। इसलिए जहाँ इस समय मैं खड़ा हूँ, वहाँ मेरी जगह आप भी हो सकते थे। दो टकरानेवाले व्यक्ति होने के नाते आपमें और मुझमें, बहुत बड़ी समानता है। यही समानता आपमें और उसमें, उसमें और उस दूसरे में, उस दूसरे में और मुझमें...बहरहाल इस गणित की पहेली में कुछ नहीं रखा है। बात इतनी है कि विभाजित हो कर मैं किसी-न-किसी अंश में आपमें से हर-एक व्यक्ति हूँ और यही कारण है कि नाटक के बाहर हो या अंदर, मेरी कोई भी एक निश्चित भूमिका नहीं है।
रीना: इतने साधारण ढंग से उड़ा देने की बात नहीं है, अंकल ! मैं यहाँ थी, तो मुझे कई बार लगता था कि मैं एक घर में नहीं, चिड़ियाघर के एक पिंजरे में रहती हूँ जहाँ...आप शायद सोच भी नहीं सकते कि क्या-क्या होता रहा है यहाँ। पापा का चीखते हुए मम्मी के कपड़े तार-तार कर देना...उनके मुँह पर पट्टी बाँध कर उन्हें बंद कमरे में पीटना...खींचते हुए गुसलखाने में कमोड पर ले जा कर...(सिहर कर) मैं तो बयान भी नहीं कर सकती कि कितने-कितने भयानक दृश्य देखे हैं इस घर में मैंने। कोई भी बाहर का आदमी उस सबको देखता-जानता  ......सच कहु तो कोई देख ही नहीं पता।
सावित्री: (आवेश में) मत कहिए मुझे महेंद्र की पत्नी। महेंद्र भी एक आदमी है, जिसके अपना घर-बार है, पत्नी है, यह बात महेंद्र को अपना कहनेवालों को शुरू से ही रास नहीं आई। महेंद्र ने ब्याह क्या किया, आप लोगों की नजर में आपका ही कुछ आपसे छीन लिया। महेंद्र अब पहले की तरह हँसता नहीं। महेंद्र अब दोस्तों में बैठ कर पहले की तरह खिलता नहीं ! महेंद्र अब पहलेवाला महेंद्र रह ही नहीं गया ! और महेंद्र ने जी-जान से कोशिश की, वह वही बना रहे किसी तरह। कोई यह न कह सके जिससे कि वह पहलेवाला महेंद्र रह ही नहीं गया। और इसके लिए महेंद्र घर के अंदर रात-दिन छटपटाता है। दीवारों से सिर पटकता है। बच्चों को पीटता है। बीवी के घुटने तोड़ता है। दोस्तों को अपना फुरसत का वक्त काटने के लिए उसकी जरूरी है। महेंद्र के बगैर कोई पार्टी जमती नहीं ! महेंद्र के बगैर किसी पिकनिक का मजा नहीं आता था ! दोस्तों के लिए जो फुरसत काटने का वसीला है, वही महेंद्र के लिए उसका मुख्य काम है जिंदगी में। और उसका ही नहीं, उसके घर के लोगों का भी वही मुख्य काम होना चाहिए। तुम फलाँ जगह चलने से इन्कार कैसे कर सकती हो ? फलाँ से तुम ठीक तरह से बात क्यों नहीं करतीं ? तुम अपने को पढ़ी-लिखी कहती हो ?...तुम्हें तो लोगों के बीच उठने-बैठने की तमीज नहीं। एक औरत को इस तरह चलना चाहिए, इस तरह बात करनी चाहिए, इस तरह मुस्कराना चाहिए। क्यों तुम लोगों के बीच हमेशा मेरी पोजीशन खराब करती हो? और वही महेन्द्र जो दोस्तों के बीच दब्बू-सा बना हलके-हलके मुस्कराता है, घर आ कर एक दारिंदा बन जाता है। पता नहीं, कब किसे नोच लेगा, कब किसे फाड़ खाएगा ! आज वह ताव में अपनी कमीज को आग लगा लेता है। कल वह सावित्री की छाती पर बैठ कर उसका सिर जमीन से रगड़ने लगता है। बोल, बोल, बोल, चलेगी उस तरह कि नहीं जैसे मैं चाहता हूँ ? मानेगी वह सब कि नहीं जो मैं कहता हूँ ? पर सावित्री फिर भी नही चलती। वह सब नहीं मानती। वह नफरत करती है इस सबसे - इस आदमी के ऐसा होने से। वह एक पूरा आदमी चाहती है अपने लिए एक...पूरा...आदमी। गला फाड़ कर वह यह बात कहती है। कभी इस आदमी को ही यह आदमी बना सकने की कोशिश करती है। कभी तड़प कर अपने को इससे अलग कर लेना चाहती है। पर अगर उसकी कोशिशों से थोड़ा फर्क पड़ने लगता है इस आदमी में, तो दोस्तों में इनका गम मनाया जाने लगता है। सावित्री महेन्द्र की नाक में नकेल डाल कर उसे अपने ढंग से चला रही है। सावित्री बेचारे महेन्द्र की रीढ़ तोड़ कर उसे किसी लायक नहीं रहने दे रही है ! जैसे कि आदमी न हो कर बिना हाड़-मांस का टुकड़ा हो वह एक - बेचारा महेन्द्र!
राजेश: बेशक! कितना बड़ा दम्‍भ है। हम घास-फूस के छप्‍परों को बह जाने देते हैं। ढोर-ढंगर को बह जाने देते हैं। आदमियों को बचाने के लिए चन्‍दा करते हैं। क्‍यों! क्‍या ये आदमी घास-फूस और ढोर-ढंगर से किसी माने में बेहतर होते हैं? कभी नहीं डाक्‍टर! ये लोग कीड़ों से भी बदतर होते हैं। इनका जिन्‍दा रहना दुनिया के लिए अभिशाप है और इनके लिए यातना। फिर इन्‍हें क्‍यों न मरने दिया जाय। मैं जब कभी सोचता हूँ कि इस धरती पर करोड़ों आदमीनुमा कीड़े रेंगते हैं और नारकीय जिन्‍दगी बिताते हैं तो मेरा मन गुस्‍सा और तरस से भर जाता है। ये, हम सब, क्‍या हैं हमारी जिन्‍दगी के माने? करोड़ों साल से हम लोग सितारों की छाँह में धरती पर अपने पद-चिह्न बनाते हुए चले आए हैं। मगर हैं हम सब भी कीड़े के कीड़े! हमारा अस्तित्‍व मिट जाय तभी अच्‍छा हो। मुझे तो अफसोस है कि ये बाढ़ें इतनी कम क्‍यों आती हैं? मनु के जमाने का जल प्रलय क्‍यों नहीं आता है! इन्‍सान की जिन्‍दगी का नाम-निशान क्‍यों नहीं खत्‍म हो जाता? कीड़े? ये सब मरने के लिए बने हैं।
पद्मा: आखिर हो न पुरुष! अधिकार की प्‍यास जायगी थोड़े। ब्‍याह हो गया होता तो जाने क्‍या करते... [कृष्‍णा स्‍तब्‍ध रह जाता है ... एकटक पद्मा की ओर देखता है, धीरे-धीरे कुर्सी पर बैठ जाता है। माथे पर हाथ रख कर, सोचने लगता है। पद्मा उठती है और धीरे-धीरे कुर्सी के पीछे खड़ी हो जाती है। बालों में उँगलियाँ डाल कर -] नाराज हो गए कृष्‍णा [चुप रहता है... कन्‍धा झकझोर कर] बोलो! सचमुच मैं अपने को समझ नहीं पाती कृष्‍णा, मुझे क्‍या हो गया है। मैं जानती हूँ तुम्‍हारे मन में मेरे लिए क्‍या है, लेकिन क्‍या करूँ कृष्‍णा! उनके मन के दर्द को जिस दिन पहचाना है उस दिन से जैसे उसने मन को बाँध लिया है। लगता है जैसे उनके दर्द का एक जर्रा मेरे सारे व्‍यक्तित्‍व, सारे प्रेम से बड़ा है। मेरा प्रेम अब भी तुम्‍हारे लिए है, लेकिन लगता है यदि उनके दर्द में जरा-सी कमी हो सके तो मेरा सारा व्‍यक्तित्‍व सार्थक हो जाय। यकीन मानो कृष्‍णा, मैं उन्‍हें प्‍यार नहीं करती। उनकी आँखों में इतनी अँधेरी गहराइयाँ हैं कि उनमें झाँकते हुए मुझे डर लगता है, लेकिन जाने कैसा जहरीला जादू है उनमें कि डूब जाती हूँ। मुझे कुछ अपने ऊपर बड़ा गुस्‍सा आता है और जब वह मुझ से नहीं सम्‍हल पाता तो तुम पर उतर जाता है कृष्‍णा! ...बोलो... [कृष्‍णा केवल आँख उठा कर देखता है और चुपचाप सर नीचे कर लेता है]... माफ कर दो कृष्‍णा! थोड़े दिन में तो वे यहाँ से चले जाएँगे, तब तक उनकी सेवा कर लेने दो!
राजेश: नहीं अब मैं ठीक हूँ... बिलकुल ठीक... हाँ तो मुझमें उस वख्‍त जाने कितनी ताकत आ गई! मैं देवी के मन्दिर के पास गया। मैंने अपने मन में सोचा था कि बहुत भयानक जगह होगी। लेकिन वह तो बहुत खुशनुमा जगह थी। मन्दिर का सिर्फ गुम्‍बद चमक रहा था। पीपल और पाकड़ के पेड़ डूब गए थे। इतनी खामोशी थी चारों ओर कि लगता था हजारों मील से पत्‍थरों से टकराती, गाँवों को डुबाती हुई यह नदी इन पेड़ों की छाँह में आ कर सो गई है। मैं चुपचाप खड़ा रहा। कुछ दूर तक पेड़ों की छाँह से पानी साँवला पड़ गया था। थोड़ी देर में सूरज डूबने लगा। सैकड़ों सिन्‍दूरी बादल पानी में उतर आए और फूल की तरह धीरे-धीरे बहने लगे। मैं चुपचाप था। पता नहीं किसने मेरे कदमों की ताकत छीन ली थी। धीरे-धीरे मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मुझे लगा मैं क्‍यों मरना चाहता हूँ। जिन्‍दगी तो इतनी सुन्‍दर है, इतनी शान्‍त है। मुझे जिन्‍दगी का नया पहलू मिला उस दिन! वह यह कि चाहे ऊपर की सतह मटमैली हो, मगर जिन्‍दगी की तहों के नीचे गुलाब के बादलों का कारवाँ चलता रहता है। क्रूरता, कुरूपता के नीचे सौन्‍दर्य है, प्रेम है और सौन्‍दर्य और प्रेम, कुरूपता और क्रूरता को चीर कर नीचे पैठ जाता है। उसे देखने के लिए सहज आँख में नया सूरज होना चाहिए, पद्मा! [गहरी साँस लेकर] और धीरे-धीरे लगा कि जैसे मन की सारी कटुता, सारी निराशा, सारा अँधेरा, धुलता जा रहा है। लगा कि जब तक जिन्‍दगी में एक कण सौन्‍दर्य है, तब तक मरना पाप है। पागलों की तरह उन्‍हीं तैरते हुए बादलों के साथ मैं चल पड़ा... अँधेरा हो गया... [शीला दूध लाकर रख देती है और बैठ जाती है] मैं वहीं बैठ गया। थोड़ी देर में उधर कुछ सियार आए। वे लोग किसी की लाश को घसीट रहे थे। मुझे देख कर भागे। मैं समीप गया; देखा एक दस-बारह साल का लड़का है। अभी साँस चल रही है। मैंने उसे बाहर निकाला। मन काँप उठा। मगर उठा कर लाने की ताकत नहीं थी। कितना सुन्‍दर था वह, कितना मासूम! मैं बैठ कर सियारों से उसकी रखवाली करने लगा। उस तरफ सितारे थे, इस तरफ लाश। बीच में मैं उसकी रखवाली कर रहा था। चारों ओर सुनसान! लग रहा था आसमान से अजब-सी शान्ति मेरी आत्‍मा पर बरस रही है। मेरे व्‍यक्तित्‍व के रेशे फिर से सुलझते जा रहे हैं, और यह लड़का वह चिरन्‍तर जीवन है, वह सौन्‍दर्य है जिसकी रखवाली मैं युगों से करता आ रहा हूँ और युगों तक करता जाऊँगा। जिन्‍दगी नील कमल की तरह मेरे सामने खुल गई। मुझे लगा कि आदमी सारी तकलीफ और दर्द के बावजूद इसलिए जिन्‍दा है कि वह सौन्‍दर्य और जीवन की खोज करे, उसकी रक्षा करे, उसका निर्माण करे... और सौन्‍दर्य के निर्माण के दौरान वह खुद दिनों-दिन सुन्‍दर बनता जाय। अगर कोई नहीं है उसके साथ तो भी वह सौन्‍दर्य का सपना, वह ईश्‍वर के साथ है। उसे आगे बढ़ना ही है... यही जिन्‍दगी के माने हैं। इसलिए मैं फिर जिन्‍दगी में वापस लौट आया कि क्रूरता और कमजोरी के सामने हारूँगा नहीं, मरूँगा नहीं, सौन्‍दर्य का सृजन करूँगा और सुन्‍दर बनूँगा। जिन्‍दगी बहुत प्‍यारी है, बहुत अच्‍छी है, और आदमी को बहुत काम करना है।
तजकिरानवीस: मियाँ, अब कैसी दिल्‍ली, कहाँ का दरबार और कौन-से अकबरे-सानी! अकबरो-आलमगीर वगैरह के बाद आलमगीरे-सानी और शाह आलम-सानी और अकबरे-सानी लौहे-सल्‍त-नते-मुग लिया पर हर्फे-मुकर्रर (दोहराये गये अक्षर) की तरह आते हैं और उजड़ी हुई दिल्‍ली की खराबए-वहशतनाक (भयानक निर्जन स्‍थान) में, जिसका नाम कभी किलए-मुअल्‍ला (ऊँचा या श्रेष्‍ठ किला) था, एक लुटा-पिटा दरबार जम जाता है। घड़ी-भर के लिए शेरो-अदब की आवाज बुलंद होती है, फिर वही वहशतों का हमला और वही हू (सुनसान) का आलम। लोग अवध या दकन की तरफ भाग निकले हैं और दिल्‍ली के गोरिस्‍ताने-शाही (शाही कब्रिस्‍तान) में फिर वही कुत्‍ते लौटते हैं और उल्‍लू बोलता है।
मीर: (बेनीप्रसाद से) सुन लिया, बेनी परशाद। अब बताओ ककड़ी के मौजू पर इससे बेहतर नज्‍म हो सकती है? ये सनाए व बदाए (अलंकार तथा नये प्रयोग), ये तश्‍बीहें-इस्‍तआरे (उपमाएं), तलमीह (संकेत)-यानी शेरो-शायरी और इल्‍मो-अदब में जिसे हुस्‍ने-बयान कहते हैं - यह सब क्‍या है। सुनो, एक दानाए-राज की बात सुनो और हमेशा के लिए पल्‍लू से बाँध लो। किसी पाये के मुअल्लिस ने अपने एक शादिर्ग को इल्‍मे-बयान बड़ी मेहनत से पढ़ाया। जब लड़का पढ़-लिखकर फारिग हुआ तो उस्‍ताद ने कहा : अब जाओ, बाजारों और गालियों में घूम-फिरकर लोगों की बातें सुनो और पता लगाओ कि इन बातों का इल्‍मे-बयान से क्‍या रिश्‍ता है। लड़का गली-कुचों की खाक छानता फिरा, मगर उसको लोगों की बातों का ताल्‍लुक इल्‍मे-बयान से मालूम न हुआ। उसने उस्‍ताद से हाल कह सुनाया। उस्‍ताद ने उसे फिर बाये-बिस्मिल्‍लाह (बिस्मिल्‍लाह शब्‍द की 'ब' ध्‍वनि, बिलकुल शुरू) से ताये-तमत (तमत शब्‍द ध्‍वनि, बिलकुल अंत) तक इल्‍म सिखाया और कहा कि एक बार फिर बाजारों के चक्‍कर काटो और यही बात दरयाफ्त करो। इस दफा कुछ थोड़ा-सा ताल्‍लुक शादिर्ग की समझ में आया। उसने वापस आकर कहा : हाँ, थोड़ा-सा ताल्‍लुक मालूम होता है। इस पर उस्‍ताद ने कहा : अभी तुम इल्‍मे-बयान को समझे नहीं, फिर पढ़ो। शुरू से आखिर तक एक बार फिर सब-कुछ पढ़ चुकने के बाद शादिर्ग क्‍या देखता है कि किसी शख्‍स की कोई बात ऐसी नहीं जिसका ताल्‍लुक इल्‍मे-बयान से न हो। कुछ समझे?

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About the Author

Stagey Actor
I am an Actor by profession. A few years after graduating in theater arts, I realized that I should do something to promote art. Just since then my aim is to share my knowledge to all people. I hope all of you are with me. ART IN MY HEART

1 Comment on "Best Hindi Theatre Monologues"

  1. bro i liked your effort for everything on site please keep going and write some more hindi monologues from plays

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